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ग़ज़ल
जिन दिनों लफ़्ज़ों में अक्स-ए-सुर्ख़ी-ए-रुख़्सार था
मेरी तख़लीक़ात का हर नक़्श इक शहकार था
शाहिद शैदाई
ग़ज़ल
अब के जुनूँ में लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं
ज़ख़्म-ए-जिगर में सुर्ख़ी-ए-रुख़सार भी नहीं
बशीर फ़ारूक़ी
क़ितआ
सारे आलम में ये उड़ता हुआ गुल-रंग निशाँ
सच बता सुर्ख़ी-ए-रुख़्सार-ए-सहर है कि नहीं
अली सरदार जाफ़री
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नज़्म
इंतिज़ार
देख कर सुर्ख़ी-ए-रुख़्सार-ए-गुलिस्ताँ गुलचीं
अपने दस्तूर में तरमीम किए जाता है
परवेज़ शाहिदी
नज़्म
उजाले की लकीर
साक़ी-ए-वक़्त के रुख़्सार पे लहराया है
ये है तारीक फ़ज़ाओं में उजाले की लकीर
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
खिलाया परतव-ए-रुख़्सार ने क्या गुल समुंदर में
हुबाब आ कर बने हर सम्त से बुलबुल समुंदर में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हवा में जब उड़ा पर्दा तो इक बिजली सी कौंदी थी
ख़ुदा जाने तुम्हारा परतव-ए-रुख़्सार था क्या था
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
हवा में जब उड़ा पर्दा तो इक बिजली सी कौंदी थी
ख़ुदा जाने तुम्हारा परतव-ए-रुख़्सार था क्या था
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
तमाँचा बाग़ के रुख़्सार पर लगा किस का
कि ताएरों का भी रंग-ए-सुख़न शिकस्ता है
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
तन्हाई सी तन्हाई है कैसे कहें कैसे समझाएँ
चश्म ओ लब-ओ-रुख़्सार की तह में रूहों के वीराने हैं
इब्न-ए-सफ़ी
ग़ज़ल
हुस्न-ए-रुख़्सार बढ़ा ख़त की नुमूदारी से
ज़ीनत-ए-सफ़हा हुई जदवल-ए-ज़ंगारी से
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-सब्ज़ा से है जो रुख़्सार पर ग़ुबार
अगले बरस इसे ख़त-ए-गुलज़ार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
गुल-गूना-ए-तरक़्क़ी-तहज़ीब-ओ-'इल्म से
शुक्र-ए-ख़ुदा कि सुर्ख़ हैं रुख़्सार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अब कोई तिरा मिस्ल नहीं नाज़-ओ-अदा में
अंदाज़ में शोख़ी में शरारत में हया में