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नज़्म
एक आरज़ू
मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को
सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लौह-ओ-क़लम
मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से
तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
लेनिन
चेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सर-ए-शाम
या ग़ाज़ा है या साग़र ओ मीना की करामात
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
साया-ए-चश्म में हैराँ रुख़-ए-रौशन का जमाल
सुर्ख़ी-ए-लब में परेशाँ तिरी आवाज़ का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
किसान
पारा पारा अब्र सुर्ख़ी सुर्ख़ियों में कुछ धुआँ
भूली-भटकी सी ज़मीं खोया हुआ सा आसमाँ
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
सुर्ख़ी में नहीं दस्त-ए-हिना-बस्ता भी कुछ कम
पर शोख़ी-ए-ख़ून-ए-शोहदा मेरे लिए है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
तिरे हाथों की सुर्ख़ी ख़ुद सुबूत इस बात का दे है
कि जो कह दे है दीवाना वो कर के भी दिखा दे है






