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tangii-e-jaa
तंगी-ए-जा تَنْگیٔ جا
जगह की तंगी, स्थान की संकीर्णता।।
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ग़ज़ल
समुंदर भी तिरी आँखों में सहरा की तरह गुम है
यहाँ वो तंगी-ए-जा की दुहाई क्यूँ नहीं देता
ज़ुबैर शिफ़ाई
ग़ज़ल
ज़ब्त-ए-ग़म से लाख अपनी जान पर बन आए है
हाँ मगर ये इज़्ज़त-ए-सादात तो रह जाए है
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ये जो कहा कि पास-ए-इश्क़ हुस्न को कुछ तो चाहिए
दस्त-ए-करम ब-दोश-ए-ग़ैर यार ने रख दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
शेर
दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल
बर्क़-ए-निगाह-ए-नाज़ ने गिर के बता दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद
हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तन्हाई सी तन्हाई है कैसे कहें कैसे समझाएँ
चश्म ओ लब-ओ-रुख़्सार की तह में रूहों के वीराने हैं
इब्न-ए-सफ़ी
ग़ज़ल
उन की बाँहों के हल्क़े में इश्क़ बना है पीर-ए-तरीक़
अब ऐसे में बताओ यारो किस जा कुफ़्र किधर ईमान
इब्न-ए-सफ़ी
ग़ज़ल
ख़ुशियाँ जा बैठीं कहीं ऊँची सी इक टहनी पर
दिल के बहलाने को इक लफ़्ज़-ए-क़ज़ा रक्खा है
इब्न-ए-उम्मीद
नअत
अब तंगी-ए-दामाँ पे न जा और भी कुछ माँग
हैं आज वो माइल-ब-अता और भी कुछ माँग