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नज़्म
आख़िरी आदमी का रजज़
सुकून ही सुकून है
फ़ुग़ान-ए-ख़ल्क़ अहल-ए-ताइफ़ा की नज़्र हो गई
इफ़्तिख़ार आरिफ़
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शेर
तसद्दुक़ इस करम के मैं कभी तन्हा नहीं रहता
कि जिस दिन तुम नहीं आते तुम्हारी याद आती है
जलील मानिकपूरी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
मुझे तेरी ख़यानत ने ग़ज़ब मजरूह कर डाला
मगर तैश-ए-शदीदाना के ब'अद आख़िर ज़माने में
जौन एलिया
नज़्म
कोई ये कैसे बताए
कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है
वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
सुर्ख़ गुलाब और बदर-ए-मुनीर
ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैं
और उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैं
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए
इस सई-ए-करम को क्या कहिए बहला भी गए तड़पा भी गए
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
दो इश्क़
तड़पा है इसी तौर से दिल उस की लगन में
ढूँडी है यूँही शौक़ ने आसाइश-ए-मंज़िल











