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ग़ज़ल
कहाँ ज़ौक़-ए-तन-आसानी में आसानी मयस्सर थी
तलाश-ए-राहत-ए-मंज़िल में दिल गुम-कर्दा मंज़िल था
नातिक़ गुलावठी
ग़ज़ल
तलाश-ए-मंज़िल-ए-राहत में हम जहाँ गुज़रे
फ़रेब-ख़ुर्दा उमीदों के दरमियाँ गुज़रे
होश नोमानी रामपुरी
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ग़ज़ल
बाइ'स-ए-राहत-ए-दिल मेरा मुक़द्दर निकला
जिस को समझा था बयाबाँ वो मिरा घर निकला
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
ग़ज़ल
क्यूँ ख़याल-ए-रंज-ओ-राहत से न हों बेगाना हम
जल्वा-गाह-ए-यार है दिल या'नी ख़ल्वत-ख़ाना हम
नातिक़ गुलावठी
ग़ज़ल
उड़ता है शौक़-ए-राहत-ए-मंज़िल से अस्प-ए-उम्र
महमेज़ कहते हैंगे किसे ताज़ियाना क्या
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
तलाश-ए-राहत-ए-दुनिया से क्या ग़रज़ मुझ को
अमीन-ए-ग़म हूँ यही मेरे घर में रहता है
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
अपने ही नक़्श-ए-क़दम संग-ए-निशान-ए-मंज़िल
अपने ही दम से बसीरत है ये बीनाई है
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
ग़म-ए-दौराँ की रही या ग़म-ए-जानाँ की रही
अल-ग़रज़ छेड़ रही मंज़िल-ए-नाकाम के साथ



