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ग़ज़ल
दिया मरीज़-ए-मोहब्बत को नुस्ख़ा-ए-तप-ए-दिक़
तुझे इलाज भी ऐ चारागर नहीं आता
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
हास्य
मुफ़लिसी क़र्ज़ ज़'ईफ़ी ओ तप-ए-दिक़ के सिवा
दिल को कुछ और भी ग़म हो तो ग़ज़ल होती है
जौहर सीवानी
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ग़ज़ल
दिल में पोशीदा तप-ए-इश्क़-ए-बुताँ रखते हैं
आग हम संग की मानिंद निहाँ रखते हैं