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नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
तर्शे हुए लबों के बहकते ख़िताब से
ज़रतार काकुलों के महकते सहाब से
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सावन के महीने
गुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदे
गुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीने
जोश मलीहाबादी
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ग़ज़ल
अभी किस मुँह से मैं दावा करूँ शादाब होने का
अभी तर्शे हुए शाने पे बाज़ू भी नहीं निकला
इक़बाल साजिद
ग़ज़ल
ये 'सय्यद' ख़्वाब से तर्शे हुए नाज़ुक हसीं पैकर
नुक़ूश-ए-रश्क-ए-सेहर-ए-सामरी में अक्स किस का है
सय्यद शकील दस्नवी
ग़ज़ल
यहाँ तर्शे हुए लफ़्ज़ों का सिक्का चल नहीं सकता
ये बाज़ार-ए-मआनी है यहाँ मोती भी क़तरा है
जमील मज़हरी
नज़्म
न जाने क्यों
अब वो उगला सा उन्हें ज़ौक़-ए-तकल्लुम भी नहीं
उन के तर्शे हुए होंटों पे तबस्सुम भी नहीं
बिसमिल देहलवी
ग़ज़ल
सोच से पैकर कैसे तर्शे सोच का अंत निराला है
ख़ाक पे बैठे आड़े-तिरछे नक़्श बनाते रहते हैं
अख़तर इमाम रिज़वी
नज़्म
ऐ ज़ोहरा-जबीं नाच
किस नाज़ से रह रह के चमकती है ये बिजली
जैसे तिरे तर्शे हुए होंटों पे तबस्सुम


