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नज़्म
औरत
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़
तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रेख़्ता शब्दकोश
tauq
तौक़ طَوق
(उमूमन) लोहे का भारी हलक़ा जो मुजरिमों या दीवानों के गले में डालते हैं ताकि गर्दन ना उठा सकीं
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ग़ज़ल
ये अदा देख के कितनों का हुआ काम तमाम
नीमचा कल जो टुक उस अरबदा-जू का निकला
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
कर गए कूच कहाँ
तू किसी क़र्या-ए-ज़िंदाँ में है शायद कि जहाँ
तौक़ ही तौक़ हैं दीवारें ही दीवारें हैं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
सहरा ज़िंदाँ तौक़ सलासिल आतिश ज़हर और दार ओ रसन
क्या क्या हम ने दे रखे हैं आप के एहसानात के नाम
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
नज़्म
तौक़-ओ-दार का मौसम
यही जुनूँ का यही तौक़-ओ-दार का मौसम
यही है जब्र यही इख़्तियार का मौसम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
नशात-ए-उमीद
पाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़
घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
इश्क़ अपने मुजरिमों को पा-ब-जौलाँ ले चला
गुलू में कभी तौक़ का वाहिमा
कभी पाँव में रक़्स-ए-ज़ंजीर

