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ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन
काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
कभी वो देखते हैं अपने तेग़ ओ बाज़ू को
कभी वो ग़ैज़ से मुझ पर निगाह करते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्या पान की सुर्ख़ी ने किया क़त्ल किसी को
शिद्दत से है क्यूँ आज तिरी तेग़-ए-ज़बाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
मुझ से न पूछ अपनी ही तेग़-ए-अदा से पूछ
क्यूँ तेरी चश्म-ए-लुत्फ़ भी मरहम न हो सकी
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
दिल है बस अब अलम से शक़ यास से रंग रुख़ है फ़क़
देखेंगे हम कब ऐ 'क़लक़' आँखों से मर्क़द-ए-अली
असद अली ख़ान क़लक़
नज़्म
क़ुबलाई ख़ान का ख़्वाब एक फ़िक़रा कॉलरिज की तर्ज़ पर
पत्ता पत्ता बूटा बूटा शे’र-ओ-फ़न
जल्वा-गाह-ए-तेग़-ए-दस्त-ए-सीम-तन
आलिम अख़्तर जाज़िब
शेर
वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी
वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
आज़ादी-ए-वतन
वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी
वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी