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ग़ज़ल
वो तो हवा-ए-वक़्त के झोंके थे ऐ 'ख़लीक़'
क्यों आज सोचते हो कि यारों को क्या हुआ
ख़लीक़ बुरहानपुरी
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ग़ज़ल
ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-शब-ए-ग़म का ये आलम है 'ख़लीक़'
मुँह छुपाए हुए जैसे मह-ओ-अख़्तर निकले
ख़लीक़ बुरहानपुरी
ग़ज़ल
उम्र भर ज़ौक़-ए-फ़न-ए-शेर रहा हम को 'ख़लीक़'
रंग जज़्बात का अशआ'र में भरते ही रहे
ख़लीक़ बुरहानपुरी
ग़ज़ल
वाबस्ता मसर्रत से दिल क्या हो 'ख़लीक़' अपना
फ़ुर्सत ही नहीं मिलती ग़म-हा-ए-निहानी से
ख़लीक़ बुरहानपुरी
ग़ज़ल
कभी वो देखते हैं अपने तेग़ ओ बाज़ू को
कभी वो ग़ैज़ से मुझ पर निगाह करते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्या पान की सुर्ख़ी ने किया क़त्ल किसी को
शिद्दत से है क्यूँ आज तिरी तेग़-ए-ज़बाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
'फ़ज़ा' है ख़ालिक़-ए-सुब्ह-ए-हयात फिर भी ग़रीब
कहाँ कहाँ न उफ़ुक़ की तलाश में डूबा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन
काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
मुझ से न पूछ अपनी ही तेग़-ए-अदा से पूछ
क्यूँ तेरी चश्म-ए-लुत्फ़ भी मरहम न हो सकी