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नज़्म
बंजारा-नामा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
गर तो है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
होली की बहारें
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
इस ऐश मज़े के आलम में एक ग़ोल खड़ा महबूबों का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
पैसा
नक़्श याँ जिस के मियाँ हाथ लगा पैसे का
उस ने तय्यार हर इक ठाठ किया पैसे का
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
किसी दिन बज़्म-ए-साक़ी से निकाले जाओगे 'क़ैसर'
निभाओगे कहाँ तक ठाठ ये शाहाना रोज़ाना
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
नए सुर की तमसील
जिस में रागों का जौहर बँधा है
कहीं एेमनी रस कहीं मारवा ठाठ भाग्यश्री
अख़्तर उस्मान
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नज़्म
होली
मँगवाए थाल गुलालों के भर डाले रंगों से मटके
फिर साँग बहुत तय्यार हुए और ठाठ ख़ुशी के झुर मटके
नज़ीर अकबराबादी
हास्य
हिज्र के सीज़न में हम ने भी इरादा कर लिया
ठाठ से खटिया बिछा कर दिन ढले सो जाएँगे
मसरूर शाहजहाँपुरी
नज़्म
गुड्डे गुड़िया का ब्याह
इसी ठाठ से चल के बारात आई
दुल्हन की तरफ़ से हुई पेशवाई
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
ग़ज़ल
कहो ये रिंदान-ए-एशिया से कि बज़्म-ए-इशरत के ठाठ बदले
उड़न-खटोला है अब मिसों का गई परीजान की वो डोली
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
सहेली बूझ पहेली
बुज़-ग़ाला-ए-अफ़रंग शगालों के जिलौ में
किस ठाठ से ज़रग़ाम-सिफ़त बोल रहा है
