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नज़्म
दिसम्बर
सुब्ह-सलोनी गर्म चाय की प्याली ले कर दौड़ी
कैसा थर-थर काँप रहे हैं हाए दिसम्बर बाबा
अब्दुर्रहीम नश्तर
ग़ज़ल
फ़ुटपाथों पर रहने वाले थर-थर काँपते रहते हैं
दौलत वाले सोते हैं जब कम्बल और रज़ाई में
अहसन इमाम अहसन
ग़ज़ल
ग़र्क़ रहना था जिन्हें गुमनामियों के बहर में
वो भी देखो सुर्ख़ी-ए-अख़बार पे आने लगे
