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नज़्म
जाड़े की बहारें
चिल्ला ग़म ठोंक उछलता हो तब देख बहारें जाड़े की
तन ठोकर मार पछाड़ा हो और दिल से होती हो कुश्ती सी
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
ऐ जुनूँ उस्ताद बस ख़म ठोंक कर आ जाइए
हाँ ख़लीफ़ा हम भी देखें पहलवानी आप की
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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शेर
मिरी आँखों में कीलें ठोंक दो होंटों को सिलवा दो
बसीरत जुर्म है मेरा सदाक़त मेरी आदत है
लतीफ़ शाह शाहिद
ग़ज़ल
भला मुझ से देव के सामने कोई ठोंक सकते हैं ख़म भला
अरे ये अंगूठे से आदमी तो बिचारे ख़ुद हैं बटेर से
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
हो गई ख़म ठोंक कर देव-ए-ख़िज़ाँ के सामने
क्या कसीले हैं जवानान-ए-चमन के हाथ पाँव
वज़ीर अली सबा लखनवी
नज़्म
शहर और मैं
ठोंक दी जाएगी अब शायद सभी ज़ेहनों में कील
उठ रही है हर तरफ़ जलते अँधेरों की फ़सील
चन्द्रभान ख़याल
नज़्म
होली
किसी को गालियाँ दीं और किसी को ठोंक दिया
ये छोड़ रक्खे हैं कैसे बिजार होली में

