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ग़ज़ल
सारे रिंद औबाश जहाँ के तुझ से सुजूद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझ को इमाम किया
मीर तक़ी मीर
नज़्म
लब पर नाम किसी का भी हो
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है
इब्न-ए-इंशा
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ग़ज़ल
मेरे तीखे शेर की क़ीमत दुखती रग पर कारी चोट
चिकनी चुपड़ी ग़ज़लें बे-शक आप ख़रीदें सोने से
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
नज़्म
नहीं मेरा आँचल मैला है
नहीं मेरा आँचल मेला है
और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं
परवीन शाकिर
नज़्म
मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं
इक दावत में आज मिलेंगे तिक्के और पोलाव
मुर्ग़ी के पाए का सालन बैगन का आचार
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तीखे-पन के तिरे क़ुर्बान अकड़ के सदक़े
क्या ही बैठा है लगा कर के सिपर का तकिया

