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नज़्म
रिश्वत
पत्थरों को तोड़ते हैं आदमी के उस्तुख़्वाँ
संग-बारी हो तो बन जाती है हिम्मत साएबाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स
रोक उन टूटते क़दमों को उन्हें पूछ ज़रा
पूछ ऐ भूक से दम तोड़ते ढाँचों की क़तार
साहिर लुधियानवी
शेर
गुलों को तोड़ते हैं सूँघते हैं फेंक देते हैं
ज़ियादा भी नुमाइश हुस्न की अच्छी नहीं होती
साहिर सियालकोटी
ग़ज़ल
शमीम देहलवी
ग़ज़ल
ख़ुदा समझे ये क्या सय्याद ओ गुलचीं ज़ुल्म करते हैं
गुलों को तोड़ते हैं बुलबुलों के पर कतरते हैं
लाला माधव राम जौहर
नज़्म
हम शाइ'र होते हैं
हम देवताओं के महल में नक़ब लगाया करते हैं
हम आसमान का नीला शह-दरवाज़ा तोड़ते हैं
वहीद अहमद
ग़ज़ल
जो लम्हे टूट चुके उन को जोड़ते क्यूँ हो
ये जुड़ गए तो उन्हें फिर से तोड़ते क्यूँ हो