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नज़्म
अम्मी जान
ख़ुदा रक्खे कि मुझ पर मेहरबाँ हैं किस क़दर अम्मी
बुरी देखी जो कोई बात मुझ में प्यार से टोका
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नज़्म
बे-नंग-ओ-नाम
तुम यूँही ज़िद में हुए ख़ाक-ए-दर-ए-मय-ख़ाना
मुझ को ये ज़ोम कि मैं ने तुम्हें टोका कब था
शाज़ तमकनत
ग़ज़ल
दिल की वीरानियों में हमें ख़्वाहिशें देख टोका करें
हम यतीमों के डर से डरें बिन बताए न जाया करें
अनंत गुप्ता
ग़ज़ल
उसी समय हम ने उन को टोका था बाग़बाँ जब ये कह रहे थे
बहार आते ही जी उठेगा चमन नई ज़िंदगी मिलेगी
शाद आरफ़ी
ग़ज़ल
सब ही उन का अदब करते हैं चाहने वाला कोई नहीं
टोका इक गुस्ताख़ को लेकिन अब वो ख़ुद ही पशेमाँ हैं
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
टोका-टाकी बस इक हद तक ठीक नतीजा देती है
बच्चा बिगड़ता है गर उस पे बे-मतलब की सख़्ती हो
अहमद अज़ीम
नज़्म
सियासी मस्लहत
मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई
न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
रह-ओ-रस्म-ए-आश्नाई
जहाँ इक उम्र कटी थी, इसी क़लम-रौ में
शनाख़्त के लिए हर शाहराह ने टोका

