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ग़ज़ल
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
बशीर बद्र
ग़ज़ल
हर दर्द-ए-मोहब्बत से उलझा है ग़म-ए-हस्ती
क्या क्या हमें याद आया जब याद तिरी आई
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
ग़ज़ल
मुझ को हालात में उलझा हुआ रहने दे यूँही
मैं तिरी ज़ुल्फ़ नहीं हूँ जो सँवर जाऊँगा
मुज़फ़्फ़र रज़्मी
ग़ज़ल
जहान-ए-रंग-ओ-बू उलझा हुआ है उन के डोरों में
लगी हैं काकुल-ए-तक़दीर सुलझाने तिरी आँखें
साग़र सिद्दीक़ी
नज़्म
बन-बास
एक इक लम्हे की ज़ंजीर से मैं उलझा हूँ
एक इक साँस पे ख़ुद आप से शरमाया हूँ



