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नज़्म
हिण्डोला
मुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर से
कि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असर
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
उंसुर है ख़ैर ओ शर का हर इक शय में यूँ निहाँ
हर शम'-ए-बज़्म नूरी-ओ-नारी है जिस तरह
नातिक़ लखनवी
नज़्म
महात्मा-गाँधी
वो रश्क-ए-शम-ए-हिदायात है अंजुमन के लिए
वो मिस्ल-ए-रूह-ए-रवाँ उंसुर-ए-बदन के लिए
बिस्मिल इलाहाबादी
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नज़्म
नक़्क़ाद
सच बता ऐ आशिक़-ए-देरीना-ए-फ़िक्र-ए-मआश
ज़हर में तिरयाक के उंसुर की भी की है तलाश
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ज़किर-हुसैन
उंसुर-ए-अम्न शिकन को तह-ओ-बाला कर दे
तो जो आया है तो दुनिया में उजाला कर दे
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
है मिरी तख़्लीक़ में उंसुर बग़ावत का कोई
जिस जगह पाबंदियाँ थीं उस जगह पहुँचा हूँ मैं
सालिम शुजा अन्सारी
ग़ज़ल
अपनी ही आग में ऐ 'बर्क़' जला जाता हूँ
उंसुर-ए-ख़ाक हो तुर्बत जो लड़ाई हो जाए









