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ग़ज़ल
जो लोग नहीं वाक़िफ़-ए-असरार-ए-मोहब्बत
क्या उन की निगाहों में हो मे’यार-ए-मोहब्बत
शरीफ़ुद्दीन नाशिर
ग़ज़ल
अहल-ए-दुनिया वाक़िफ़-ए-असरार-ए-पिन्हाँ हो गए
दास्तान-ए-ग़म सुना कर हम पशेमाँ हो गए
विशनू कुमार शाैक़
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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
जिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाब
कह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
यहाँ शुऊ'र के नाख़ुन तो हम भी रखते हैं
मगर ये उक़्दा-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र कहाँ खोलें
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ले दे के एक दिल था सो उस को कहाँ दिमाग़
खोलेगा कौन 'उक़्दा-ए-असरार कौन है
तमीज़ुद्दीन तमीज़ देहलवी
ग़ज़ल
जो इंसाँ बारयाब-ए-पर्दा-ए-असरार हो जाए
तो इस बातिल--कदे में ज़िंदगी दुश्वार हो जाए
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
कब खुला उक़्दा 'रज़ा' जब कर चुके इज़हार-ए-शौक़
मुद्दआ' जाएज़ था हर्फ़-ए-मुद्दआ' मा'यूब था
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का
बैठे बैठे आ गई नींद इसरार था ये किसी ख़्वाहिश का
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
इस ‘अक़ीदे ने लिया क़ैसर-ओ-किसरा से ख़िराज
मौत का वक़्त अज़ल से है मुक़र्रर देखो


