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ग़ज़ल
देखा है जिन्हें वक़्फ़-ए-आदाब-ए-ग़म-ए-जानाँ
उन से ग़म-ए-जानाँ का इज़हार नहीं होता
शाइर फ़तेहपुरी
ग़ज़ल
दिल सरापा वक़्फ़-ए-सौदा-ए-निगाह-ए-तेज़ है
ये ज़मीं मिस्ल-ए-नीस्ताँ सख़्त नावक-ख़ेज़ है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
गर्दिश-ए-वक़्त ने जब से मिरा घर देखा है
ज़ीस्त को वक़्फ़-ए-ग़म-ए-शाम-ओ-सहर देखा है
रहबर ताबानी दरियाबादी
नज़्म
फ़िक्र
ब-ईं इनआम-ए-वफ़ा उफ़ ये तक़ाज़ा-ए-हयात
ज़िंदगी वक़्फ़-ए-ग़म-ए-ख़ाक-नशीनां कर दे
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
जो मुझ को वक़्फ़-ए-ग़म-ए-इंतिज़ार होना था
तो अह्द-ओ-फ़े'ल का कुछ ए'तिबार होना था