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ग़ज़ल
वादा-ए-वस्ल-ए-अदू आज वफ़ा हो कि न हो
नाला करता तो हूँ मैं हश्र बपा हो कि न हो
मोहम्मद लुतफ़ुद्दीन ख़ान लुत्फ़
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ग़ज़ल
रंज-ए-हिज्राँ ग़म-ए-फ़ुर्क़त अलम-ए-वस्ल-ए-अदू
दम के हैं साथ मिरे जाएँगे दम जाने से
मोहम्मद लुतफ़ुद्दीन ख़ान लुत्फ़
ग़ज़ल
है शब-ए-वस्ल-ए-अदू और ज़माना महजूर
क्यूँ न बिस्तर के लिए गुल की जगह ख़ार बिके
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा मेहर-ओ-वफ़ा जौर-ओ-जफ़ा
सब के सब ख़ाना-बर-अंदाज़ नज़र आते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मिरी क़िस्मत लिखी जाती थी जिस दिन मैं अगर होता
उड़ा ही लेता दस्त-ए-कातिब-ए-तक़दीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
सदा सुनते ही गोया मुर्दनी सी छा गई मुझ पर
ये शोर-ए-सूर था या वस्ल का इंकार था क्या था
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हज़ार शर्म करो वस्ल में हज़ार लिहाज़
न निभने देगा दिल-ए-ज़ार ओ बे-क़रार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मुझे है सदमा-ए-हिज्राँ अदू को सैकड़ों ख़ुशियाँ
मिरे उजड़े हुए घर को भरी महफ़िल से क्या निस्बत