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नज़्म
अभी हम ख़ूबसूरत हैं
अब भी महबूब-ए-जहाँ है
शायरी शोरीद-गान-ए-इश्क़ के विर्द-ए-ज़बाँ है
अहमद फ़राज़
सलाम
नसीर तुराबी
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ग़ज़ल
जब सुबूही ले के विर्द-ए-मर्हबा करता हूँ मैं
ज़िंदगी को नींद से चौंका दिया करता हूँ मैं
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
साथ हर साँस के आता है ज़बाँ पर तिरा नाम
दिल में जो कुछ हो वही विर्द-ए-ज़बाँ होता है
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
विर्द-ए-ज़बाँ है रोज़-ओ-शब इन की सना-ए-हुस्न
शायाँ है जिस क़दर कि ये शाएर ग़ुलू करें
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
वो सारे लोग रंज-ओ-ग़म से पा जाते हैं आज़ादी
जो सुब्ह-ओ-शाम विर्द-ए-सूरा-ए-यासीन लेते हैं
फैज़ुल अमीन फ़ैज़
नज़्म
बस्ती की लड़कियों के नाम
वो कमसिनों के गाने वो खेल वो तराने
बे-फ़िक्री के फ़साने विर्द-ए-ज़बान-ए-सहरा
अख़्तर शीरानी
नअत
न हो ज़िक्र-ए-मुबारक आप का विर्द-ए-ज़बाँ क्यूँकर
मैं हूँ रोज़-ए-अज़ल से आशिक़-ए-शैदा मोहम्मद का
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ग़ज़ल
'सिराज' उस काबा-ए-जाँ के तसव्वुर कूँ किया सुमरन
यही विर्द-ए-सहर है और दुआ-ए-शाम ऐ वाइ'ज़
