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नज़्म
विर्सा
कल की नस्लें भी कोई चीज़ हैं हम कुछ भी सही
उन का विर्सा हूँ खंडर ये सितम ईजाद न कर
साहिर लुधियानवी
नज़्म
चादर और चार-दीवारी
दम-ए-सुब्ह दर-ब-दर हैं
हुज़ूर के नुतफ़े को मुबारक के निस्फ़ विर्सा से बे-मो'तबर हैं
फ़हमीदा रियाज़
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ग़ज़ल
हम अपने शानों पे फिरते हैं क़त्ल-गाह लिए
ख़ुद अपने क़त्ल की साज़िश हमारा विर्सा है
आशुफ़्ता चंगेज़ी
ग़ज़ल
नून मीम दानिश
नज़्म
क़दम मिला के चलो
जहाँ में गाँधी-ओ-नेहरू के विर्सा-दार हो तुम
ज़मीं पे अम्न-ओ-मुहब्बत के पासदार हो तुम
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
शेक्सपियर
आज भी काबा-ए-अरबाब-ए-नज़र है तिरी फ़िक्र
विर्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ तेरा बयाँ आज भी है
जगन्नाथ आज़ाद
ग़ज़ल
उसी पर नाज़ करती है हमेशा हाथ की रेखा
कि जिस की मुट्ठी में भी विर्सा-ए-अज्दाद होता है


