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ग़ज़ल
विसाल-ए-हक़ कभी मुश्किल कभी आसान लगता है
ज़रा सा फ़ासला है दरमियाँ दीवार अना की है
सदा अम्बालवी
नज़्म
मुझे जाना है इक दिन
अभी तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़ की कश्ती खे नहीं सकती
अभी ये ज़िंदगी दाद-ए-सदाक़त दे नहीं सकती
असरार-उल-हक़ मजाज़
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ग़ज़ल
हक़ तो ये है कि मुझे अपने ही दिल ने लूटा
कुछ तिरा शिकवा-ए-बेदाद करूँ या न करूँ
सुल्तानुल हक़ शहीदी काश्मीरी
ग़ज़ल
किस से करेंगे अर्ज़-ए-तमन्ना कहें जिसे
मिलता नहीं है कोई भी अपना कहें जिसे
सुल्तानुल हक़ शहीदी काश्मीरी
नज़्म
एक दोस्त की ख़ुश-मज़ाक़ी पर
रख भी दे अब इस किताब-ए-ख़ुश्क को बाला-ए-ताक़
उड़ रहा है रंग-ओ-बू की बज़्म में तेरा मज़ाक़
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
हम वही अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-वफ़ा साहिब-दिल
हम कि हर दौर में औराक़-ए-ज़माना के अमीं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
इल्म-ओ-हुनर है मुल्क को दरकार आज-कल
हम ख़ुद भले-बुरे के हैं मुख़्तार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल
सूरज ग़ुरूब होते ही ज़ाहिर हो नूर-ए-सुब्ह