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ग़ज़ल
विसाल-ए-हक़ कभी मुश्किल कभी आसान लगता है
ज़रा सा फ़ासला है दरमियाँ दीवार अना की है
सदा अम्बालवी
ग़ज़ल
हक़ तो ये है कि मुझे अपने ही दिल ने लूटा
कुछ तिरा शिकवा-ए-बेदाद करूँ या न करूँ
सुल्तानुल हक़ शहीदी काश्मीरी
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ग़ज़ल
किस से करेंगे अर्ज़-ए-तमन्ना कहें जिसे
मिलता नहीं है कोई भी अपना कहें जिसे
सुल्तानुल हक़ शहीदी काश्मीरी
नज़्म
मुझे जाना है इक दिन
अभी तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़ की कश्ती खे नहीं सकती
अभी ये ज़िंदगी दाद-ए-सदाक़त दे नहीं सकती