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ग़ज़ल
दर्द दिल में हों सुन ऐ यार-ए-सितम-गार कि तू
तू हुआ चोर तो फिर मैं हूँ गुनहगार कि तू
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
चलते हैं कू-ए-यार में है वक़्त-ए-इम्तिहाँ
हिम्मत न हारना दिल-ए-बीमार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
फ़िराक़-ए-यार में मेरा दिल-ए-मुज़्तर न ठहरेगा
तुम्हीं सोचो सुकूँ को ताइर-ए-बिस्मिल से क्या निस्बत
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
सुब्ह कू-ए-यार में बाद-ए-सबा पकड़ी गई
या'नी ग़ीबत में गुलों की मुब्तला पकड़ी गई