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ग़ज़ल
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त
एक युग ख़त्म हुआ युग के फ़साने भी गए
तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद
राही मासूम रज़ा
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ग़ज़ल
मोअर्रिख़ की क़लम के चंद लफ़्ज़ों सी है ये दुनिया
बदलती है हर इक युग में हमारी दास्ताँ और हम
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
यहाँ तो सब की ख़्वाहिश एक सी है रोटियाँ, सिक्के
मेरे युग में नहीं ख़्वाब-ए-जवानी माँगने वाले
मंज़र भोपाली
नज़्म
हिन्दोस्तानी बच्चे
रह न सके अब इस दुनिया में युग सरमाया-दारी का
तुम को झंडा लहराना है मेहनत की सरदारी का

