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ग़ज़ल
किसी के शिकवा-हा-ए-जौर से वाक़िफ़ ज़बाँ क्यूँ हो
ग़म-ए-दिल आग तो लग ही चुकी लेकिन धुआँ क्यूँ हो
एजाज़ वारसी
ग़ज़ल
ज़ख़्म-हा-ए-दिल को उन की ख़ाक-ए-पा याद आ गई
इश्क़ के आज़ार की आख़िर दवा याद आ गई
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
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zabaan-e-haal
ज़बान-ए-हालزَبانِ حال
वह बाहरी अवस्था या रूप जो बिना कहे ही भीतर की स्थिति को प्रकट कर दे, बाह्य संरचना
zabaan-e-haal se kahnaa
ज़बान-ए-हाल से कहनाزَبانِ حال سے کَہنا
प्रस्थिति से प्रकट होना, बिना कहे वर्तमान प्रस्थिति से प्रकट करना
ba-zabaan-e-haal
ब-ज़बान-ए-हालبَزَبانِ حال
इस हालत से जो शक्ल से दिखाई दे (कहना के साथ)
zabaan-e-haal se sunaanaa
ज़बान-ए-हाल से सुनानाزَبانِ حال سے سُنانا
प्रस्थिति से प्रकट होना, बिना कहे वर्तमान प्रस्थिति से प्रकट करना
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कुल्लियात
है जुम्बिश-ए-लब मुश्किल जब आन के वह बैठे
जो चाहें सो यूँ कह लें लोग अपनी जगह बैठे
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
ज़बान-ए-नौहागर हूँ मैं क़ज़ा ने क्या मिलाया था
मिरी तीनत में यारब सौदा-ए-दिल-हा-ए-नालाँ को
