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ग़ज़ल
ज़ख़्म-हा-ए-दिल को उन की ख़ाक-ए-पा याद आ गई
इश्क़ के आज़ार की आख़िर दवा याद आ गई
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
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रेख़्ता शब्दकोश
zabaan-e-haal
ज़बान-ए-हाल زَبانِ حال
वह बाहरी अवस्था या रूप जो बिना कहे ही भीतर की स्थिति को प्रकट कर दे, बाह्य संरचना
ba-zabaan-e-haal
ब-ज़बान-ए-हाल بَزَبانِ حال
इस हालत से जो शक्ल से दिखाई दे (कहना के साथ)
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ग़ज़ल
शाह नसीर
कुल्लियात
ज़बान-ए-नौहागर हूँ मैं क़ज़ा ने क्या मिलाया था
मिरी तीनत में यारब सौदा-ए-दिल-हा-ए-नालाँ को
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में
जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क्या ख़बर थी राज़-हा-ए-दिल ज़बाँ हो जाएँगे
मेरे दो आँसू भी मेरी दास्ताँ हो जाएँगे
शिफ़ा ग्वालियारी
नज़्म
दावत-ए-इंक़िलाब
वो ख़ाक हो कि जिस में मिलें रेज़ा-हा-ए-ज़र
वो संग बन कि जिस से निकलते हैं लाल-ए-नाब
वहीदुद्दीन सलीम
ग़ज़ल
ये क्या कि लाख सुख़न-हा-ए-ग़ुफ़्तनी हैं मगर
वो सामने हो तो फिर काम की ज़बाँ न समझ
मौलवी सय्यद मुमताज़ अली
ग़ज़ल
तुम्हीं ने लब को बख़्शी है मता-ए-ख़ामुशी वर्ना
ज़बाँ से क़िस्सा-हा-ए-शौक़ दोहराना भी आता है
रज़ा जौनपुरी
नज़्म
ये मातम-ए-वक़्त की घड़ी है
ये मोहर है यार-ए-मेहरबाँ की
ये लअ'ल लब-हा-ए-मह-विशाँ के
