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ग़ज़ल
सब रक़ीबों से हों ना-ख़ुश पर ज़नान-ए-मिस्र से
है ज़ुलेख़ा ख़ुश कि महव-ए-माह-ए-कनआँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
गर्द-फ़शाँ हूँ दश्त में सीना-ज़नाँ हूँ शहर में
थी जो सबा-ए-सम्त-ए-दिल जाने कहाँ चली गई
जौन एलिया
नज़्म
लखनऊ
सब्र-आज़मा है ग़मज़ा-ए-तुर्कान-ए-लखनऊ
रश्क-ए-ज़नान-ए-मिस्र कनीज़ान-ए-लखनऊ
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
मुसाफ़िर
ज़बान-ए-संग में जो हम-कलाम होते हैं
कुछ ऐसे लोग पुराने मुजस्समों में मिले
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
सफ़र-ए-आख़िर-ए-शब
सतीज़ा-कार रहे हैं जहाँ भी उलझे हैं
शिआर-ए-राह-ए-ज़नाँ से मुसाफ़िरों के क़दम
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
तिफ़्लाँ की तो कुछ तक़्सीर न थी
फिरता है हुजूम-ए-संग-ज़नाँ?
क्या नील बहुत हैं चेहरे पर?
फ़हमीदा रियाज़
कुल्लियात
निकले है चश्मा जो कोई जोश-ए-ज़नाँ पानी का
याद वो है वो कसो चश्म की गिर्यानी का
मीर तक़ी मीर
हास्य
साइकल ने फ़र्राटे भरे लड़कों ने ख़र्राटे भरे
फिर ज़न, ज़नाज़न, ज़न ज़नन ज़न ज़न ज़नाज़न ज़न ज़नन







