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नज़्म
इम्तिनाअ का महीना
रोज़ ओ शब बैन करती हैं दहलीज़ पर और ज़ंजीर-ए-दर मुझ से खुलती नहीं
फ़र्श-ए-हमवार पर पाँव चलता नहीं
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
बैत-ए-अंकबूत
मगर वो फ़ाहिशा ज़ंजीर-ए-दर की नींद उड़ाए जा रही है
वो आँखें ख़ूबसूरत बन गई हैं!
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
ख़ुद-आगही की ये जुरअत उँगली उठाए जुनूँ पर
शोरीदा-सर के मुक़ाबिल ज़ंजीर-ए-दर आ रही है
ग़ुलाम मुस्तफ़ा फ़राज़
नज़्म
अहद-ए-तिफ़्ली
दर्द-ए-तिफ़ली में अगर कोई रुलाता था मुझे
शोरिश-ए-ज़ंजीर-ए-दर में लुत्फ़ आता था मुझे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हिलाई जो सबा ने ज़ुल्फ़-ए-पुर-ख़म उस परी-वश को
तो वो ज़ंजीर-ए-दर हम को हिलानी अपनी याद आई