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ग़ज़ल
'बक़ा' हम गब्र-ए-ना-मुस्लिम थे पर आ कर ब-नाचारी
वो मुस्लिम-ज़ादा तिफ़्लों में मुसलमाँ हो के मिल बैठे
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
नज़्म
क्लर्क
ऐ सेक्रेट्रियट की इमारत ज़रा बता
उस वक़्त जबकि जाते हैं अफ़सर भी बौखला
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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नज़्म
हमारे दिन गुज़र गए
दलील से वरा है सारी गुफ़्तुगू का सानेहा
ज़रा ज़रा सी ज़िंदगी बड़ा बड़ा सा ख़ौफ़ है
इलियास बाबर आवान
ग़ज़ल
इज़हार करते दिल की ख़मोशी ज़रा बता
बदला है ग़म कि ग़म का मुदावा बदल गया
मोहम्मद इफ़तिख़ारुल हक़ समाज
नज़्म
उम्र का आख़िरी दिन
किसी बाब-ए-आतिश-ज़दा पर खड़ा मुस्कुराने लगा है
कहीं हिज्र की साअतें गिनते गिनते मुझे नींद आई हुई है
अहमद ज़फ़र
ग़ज़ल
मिरी तवज्जोह बस एक नुक़्ते पे मुर्तकिज़ है
मैं अपनी क़ुव्वत को एक ज़र्रा बना रहा हूँ
अंजुम सलीमी
नज़्म
वतन से ख़िताब
मुझे ऐ वतन तू ज़रा बता किधर अब हैं वो तिरी सन’अतें
जो हर एक मुल्क से लाई थीं तिरे पास खींच के दौलतें