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ग़ज़ल
अल्लाह-रे उस की चौखट है बोसा-गाह-ए-आलम
कहता है संग-ए-असवद मैं संग-ए-आस्ताँ हूँ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
काटते हैं रात दिन चक्कर तिरे कूचे का हम
तुझ से फ़ुर्सत पाएँ तो फिर सैर-ए-‘आलम भी करें
शकील इबन-ए-शरफ़
ग़ज़ल
'नरेश' अक़सा-ए-आलम जगमगा उट्ठे निगाहों में
तसव्वुर में मिरे जिस दम मिरा वो रश्क-ए-हूर आया
नरेश एम. ए
ग़ज़ल
सफ़र जारी है सदियों से हमारा नब्ज़-ए-आलम में
निगाहों से ज़माने की मगर रू-पोश रहते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
आरज़ू में तेरी ऐ गुल-पोश शहज़ादी न पूछ
कैसे आलम-ताब सरदारोँ के सर जाते रहे
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शोला-ए-हुस्न-ए-बुताँ फूँक न दे आलम को
सुर्ख़ हैं फूल से रुख़्सार बड़ी मुश्किल है



