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ग़ज़ल
वो ज़ौक़-ए-फ़न हो कि शाख़-ए-चमन कि ख़ाक-ए-वतन
हर इक का हक़ है मिरे ख़ूँ के क़तरे क़तरे पर
वफ़ा मलिकपुरी
ग़ज़ल
वो ज़ौक़-ए-फ़न हो कि शाख़-ए-चमन कि ख़ाक-ए-वतन
हर इक का हक़ है मिरे ख़ूँ के क़तरे क़तरे पर
वफ़ा मलिकपुरी
ग़ज़ल
उम्र भर ज़ौक़-ए-फ़न-ए-शेर रहा हम को 'ख़लीक़'
रंग जज़्बात का अशआ'र में भरते ही रहे
ख़लीक़ बुरहानपुरी
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ग़ज़ल
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूँही जब तक चली चले
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
आलम-ए-हुस्न ख़ुदाई है बुतों की ऐ 'ज़ौक़'
चल के बुत-ख़ाने में बैठो कि ख़ुदा याद रहे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में ऐ 'ज़ौक़'
उस ने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाकत वाले
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
कश्ती सवार-ए-उम्र हूँ बहर-ए-फ़ना में 'ज़ौक़'
जिस दम बहा के ले गया तूफ़ान बह गया
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
सुर्ख़ी-ए-पाँ देख ले ज़ाहिद जो दंदाँ पर तिरे
उठ खड़ा हो हाथ से तस्बीह-ए-मरजाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
दिल-ए-बद-ख़्वाह में था मारना या चश्म-ए-बद-बीं में
फ़लक पर 'ज़ौक़' तीर-ए-आह गर मारा तो क्या मारा
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
पहुँच रहूँगा सर-ए-मंज़िल-ए-फ़ना ऐ 'ज़ौक़'
मिसाल-ए-नक़्श-ए-क़दम करने पा-तुराब तो दे