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ग़ज़ल
फ़लक ने रंज तीर-ए-आह से मेरे ज़े-बस खेंचा
लबों तक दिल से शब नाले को मैं ने नीम रस खेंचा
ख़ान आरज़ू सिराजुद्दीन अली
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अप्रचलित ग़ज़लें
عیادت سے زبس ٹوٹا ہے دل یاران غمگیں کا
نظر آتا ہے موے شیشہ رشتہ شمع بالیں کا
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शोरिश से चश्म-ए-तर की ज़ि-बस ग़र्क़-ए-आब हूँ
दिन रात बहर-ए-ग़म में ब-रंग-ए-हुबाब हूँ
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
ज़ि-बस काफ़िर-अदायों ने चलाए संग-ए-बे-रहमी
अगर सब जम'अ करता मैं तो बुत-ख़ाने हुए होते
सिराज औरंगाबादी
शेर
ज़ि-बस हम को निहायत शौक़ है अमरद-परस्ती का
जहाँ जावें वहाँ इक आध को हम ताक रहते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
'ताबाँ' ज़ि-बस हवा-ए-जुनूँ सर में है मिरे
अब मैं हूँ और दश्त है ये सर है और पहाड़
ताबाँ अब्दुल हई
शेर
'मुसहफ़ी' तू ने ज़ि-बस गुल के लिए हैं बोसे
रश्क से देखे है बुलबुल दहन-ए-सुर्ख़ तिरा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
हूँ तिश्ना-काम-ए-दश्त-ए-शहादत ज़ि-बस कि मैं
गिरता हूँ आब-ए-ख़ंजर-ओ-शमशीर देख कर
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
ग़ज़ल
आशोब-ए-क़यामत से ज़ि-बस ख़ौफ़ है सब को
दो चार क़दम भी उन्हें चलने नहीं देते