जीते जी बस वो बुत रहा हमराह

ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

जीते जी बस वो बुत रहा हमराह

ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

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    जीते जी बस वो बुत रहा हमराह

    अब तो बंदे के है ख़ुदा हमराह

    दिल दिया उस को पर ये डरता हूँ

    दुश्मन इक दोस्त के किया हमराह

    नहीं यारान-ए-रफ़्तगाँ का निशाँ

    ले गए क्या ये नक़्श-ए-पा हमराह

    इस में क्या आप की है रुस्वाई

    रहे गर मुझ सा पारसा हमराह

    तुझे देखा जिधर निगाह गई

    था तसव्वुर ज़ि-बस तिरा हमराह

    रंज-ए-तंहाई-ए-लहद रहा

    यार के ग़म को ले लिया हमराह

    शब को जाते हो साथ लो मशअ'ल

    कहिए तो हो ये दिल-जला हमराह

    हुए बा'द अपने बेवफ़ा उश्शाक़

    ले गए याँ से हम-वफ़ा हमराह

    तेरी रफ़्तार का मैं कुश्ता हूँ

    क़ब्र तक आइयो ज़रा हमराह

    ये दिल-ए-बद-गुमाँ देख सके

    अगर उस बुत के हो ख़ुदा हमराह

    ता सलामत तू आए क़ासिद

    ठहर इतना करूँ दुआ हमराह

    उस ने तन्हा मुझे जाने दिया

    ग़म-ए-फ़ुर्क़त को कर दिया हमराह

    ना-तवाँ है बहुत ग़ुबार मिरा

    तू ज़रा रहियो सबा हमराह

    रही याँ गर्दिश और जामा-दरी

    काश लाते दस्त-ओ-पा हमराह

    गालियाँ जैसे दीं हैं दिल ले कर

    जाएगा ये दिया लिया हमराह

    जा तन्हा तू शह-ए-ख़ूबाँ

    हो 'वज़ीर'-ए-बरहना-पा हमराह

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