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ग़ज़ल
सँवार शाना-ए-फ़न से तू ज़ुल्फ़-ए-क़ौस-ए-क़ुज़ह
तू ज़िंदगी के ख़म-ओ-पेच फिर कमान पे लिख
करामत अली करामत
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शेर
फ़रीहा नक़वी
बच्चों की कहानी
دن تھے برسات کے۔ ایک بار دوڑتے دوڑتے بنو ماں کے پاس آیا۔ اس نے پوچھا: ’’ماں، تم کیا کر رہی ہو؟‘‘...
रिफ़अत सरोश
ग़ज़ल
क़ौस-ए-क़ुज़ह से टूट के हर रंग बह गया
ये ज़ुल्म भी तो आसमाँ चुप-चाप सह गया
इफ़तिख़ार अहमद इक़बाल
नज़्म
तेरे जमाल की दोशीज़गी की क़ौस-ए-क़ुज़ह
तेरे जमाल की दोशीज़गी की क़ौस-ए-क़ुज़ह
निगाह महबत-ए-इदराक में न क्यूँ रख लूँ
अलीम सबा नवेदी
ग़ज़ल
हिना के क़ौस-ए-क़ुज़ह के शजर के क्या क्या रंग
वो आँख लाई है ज़ंजीर कर के क्या क्या रंग
ख़्वाज़ा रज़ी हैदर
नज़्म
सत-रंगी क़ौस-ए-क़ुज़ह के नाम
मैं कि इक जन्नत-ए-अर्ज़ी से चला आया हूँ
बीती यादों की महक दिल में छुपा लाया हूँ
इम्तियाज़ अहमद क़मर
ग़ज़ल
आवारा बे-सम्त हवाएँ आख़िर पहुँचीं बादल तक
धूल के चेहरों को धोएँ अब क़ौस-ए-क़ुज़ह के रंगों से

