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शेर
फिर के निगाह चार-सू ठहरी उसी के रू-ब-रू
उस ने तो मेरी चश्म को क़िबला-नुमा बना दिया
नज़ीर अकबराबादी
शेर
लफ़्ज़ों से बना इंसाँ लफ़्ज़ों ही में रहता है
लफ़्ज़ों से सँवरता है लफ़्ज़ों से बिगड़ता है
इब्राहीम होश
शेर
डर अपने पीर से बी पीर पीर पीर न कर
कि तेरे पीर के वा'दे ने मुझ को पीर किया