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शेर
इक मश्ग़ला ठहरी है तुम्हें रंजिश-ए-बेजा
इक खेल हुआ तुम को सताना मिरे दिल का
सय्यद ज़हीरूद्दीन मदनी
शेर
शिकवा सय्याद का बेजा है क़फ़स में बुलबुल
याँ तुझे आप तिरा तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ लाया है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
शेर
तुम चाहो तो दो लफ़्ज़ों में तय होते हैं झगड़े
कुछ शिकवे हैं बेजा मिरे कुछ उज़्र तुम्हारे
असर रामपुरी
शेर
समर का चाहना ही सिर्फ़ बेजा है दरख़्तों से
बराबर इन दरख़्तों की हिफ़ाज़त भी ज़रूरी है
मोहम्मद यासिर मुस्तफ़वी
शेर
'सहर' अब होगा मेरा ज़िक्र भी रौशन-दिमाग़ों में
मोहब्बत नाम की इक रस्म-ए-बेजा छोड़ दी मैं ने
अबु मोहम्मद सहर
शेर
जल्वा-ए-यार से क्या शिकवा-ए-बेजा कीजे
शौक़-ए-दीदार का आलम वो कहाँ है कि जो था