aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "قطع"
क़त्अ कीजे न तअ'ल्लुक़ हम सेकुछ नहीं है तो अदावत ही सही
अहबाब मुझ से क़त-ए-तअल्लुक़ करें 'जिगर'अब आफ़्ताब-ए-ज़ीस्त लब-ए-बाम आ गया
क़त्अ होती जा रही हैं ज़िंदगी की मंज़िलेंहर नफ़्स अपनी जगह चलती हुई तलवार है
ग़ुर्बत बस अब तरीक़-ए-मोहब्बत को क़त्अ करमुद्दत हुई है अहल-ए-वतन से जुदा हुए
किया है क़त्अ रिश्ता सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार का हम नेकि शैख़ अपना मुख़ालिफ़ है तो दुश्मन बरहमन अपना
मुझी पर क़त्अ हुई है क़बा-ए-दिल-सोज़ीहवा से आ के छुपे मेरे पैरहन में चराग़
करूँ क़त्-ए-उल्फ़त बुतों से व-लेकिनये काफ़िर मिरा दिल नहीं मानता है
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जानादर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआअब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस मेंहर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
पता अब तक नहीं बदला हमारावही घर है वही क़िस्सा हमारा
मेरे रोने का जिस में क़िस्सा हैउम्र का बेहतरीन हिस्सा है
न पाक होगा कभी हुस्न ओ इश्क़ का झगड़ावो क़िस्सा है ये कि जिस का कोई गवाह नहीं
शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआआँखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ
तुम्हें भी नींद सी आने लगी है थक गए हम भीचलो हम आज ये क़िस्सा अधूरा छोड़ देते हैं
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चलेअपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले
कोई कहता था समुंदर हूँ मैंऔर मिरी जेब में क़तरा भी नहीं
उन रस भरी आँखों में हया खेल रही हैदो ज़हर के प्यालों में क़ज़ा खेल रही है
आँखें न जीने देंगी तिरी बे-वफ़ा मुझेक्यूँ खिड़कियों से झाँक रही है क़ज़ा मुझे
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता हैसमुंदरों ही के लहजे में बात करता है
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