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शेर
कोई जलता है तमाशा बन के उस की बज़्म में
मैं ग़रीब-ए-शहर था पिन्हाँ का पिन्हाँ जल गया
अख़लाक़ अहमद आहन
शेर
अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग
हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिरे अंदर कफ़न के पाँव
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
तेज़ रखियो सर-ए-हर-ख़ार को ऐ दश्त-ए-जुनूँ
शायद आ जाए कोई आबला-पा मेरे बाद
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
शेर
हूँ तिश्ना-काम-ए-दश्त-ए-शहादत ज़ि-बस कि मैं
गिरता हूँ आब-ए-ख़ंजर-ओ-शमशीर देख कर