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शेर
वो सहरा जिस में कट जाते हैं दिन याद-ए-बहाराँ से
ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर उस को चमन कहना ही पड़ता है
अर्श मलसियानी
शेर
न जाएगा मेरे दिल से ख़याल-ए-अबरू-ए-दिलबर
कि तेग़ों ही के साए में तो है जन्नत मुसलमाँ की
मोहम्मद अब्बास सफ़ीर
शेर
हम-दिगर मोमिन को है हर बज़्म में तकफ़ीर-ए-जंग
नेक सुल्ह-ए-कुल है बद है बा-जवान-ओ-पीर-ए-जंग
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
उस के मरहम से मुकर जाने का ग़ुस्सा था मुझे
वर्ना ये ज़ख़्म-ए-जिगर बार-ए-दिगर कुछ नहीं था