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शेर
फ़ैज़-ए-अय्याम-ए-बहार अहल-ए-क़फ़स क्या जानें
चंद तिनके थे नशेमन के जो हम तक पहुँचे
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
शेर
सैर-ए-बहार-ए-बाग़ से हम को मुआ'फ़ कीजिए
उस के ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ से 'दर्द' किसे फ़राग़ है
ख़्वाजा मीर दर्द
शेर
शाख़-ए-तन्हाई से फिर निकली बहार-ए-फ़स्ल-ए-ज़ात
अपनी सूरत पर हुए हम फिर बहाल उस के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
शेर
ख़ुदा रा बहर-ए-इस्तिक़बाल जल्द ऐ जान बाहर आ
अयादत को मिरी जान-ए-जहाँ तशरीफ़ लाते हैं
मर्दान अली खां राना
शेर
ये ज़ख़्म-ए-अना काफ़ी है ऐ यूसुफ़-ए-दौराँ
इस चश्म-ए-ज़ुलेख़ा को तू ग़मनाक न करना
बहारुन्निसा बहार
शेर
करते हैं अर्बाब-ए-दिल अंदाज़ा-ए-जोश-ए-बहार
मेरा दामन देख कर मेरा गरेबाँ देख कर
अब्बास अली ख़ाँ बेख़ुद
शेर
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
ऐसे पस-मंज़र में क्या रहना सर-ए-मंज़र तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
शेर
मुझे जब मार ही डाला तो अब दोनों बराबर हैं
उड़ाओ ख़ाक सरसर बन के या बाद-ए-सबा बन कर