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शेर
अबस दिल बे-कसी पे अपनी अपनी हर वक़्त रोता है
न कर ग़म ऐ दिवाने इश्क़ में ऐसा ही होता है
ख़ान आरज़ू सिराजुद्दीन अली
शेर
कौन किस का ग़म खाए कौन किस को बहलाए
तेरी बे-कसी तन्हा मैरी बेबसी तन्हा
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
शेर
अदम से हस्ती में जब हम आए न कोई हमदर्द साथ लाए
जो अपने थे वो हुए पराए अब आसरा है तो बेकसी का
जोर्ज पेश शोर
शेर
बे-कसी के दर्द ने लौ दी जल उट्ठा इक चराग़
रफ़्ता रफ़्ता उस से फिर सारा जहाँ रौशन हुआ