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शेर
ज़ब्त-ए-राज़-ए-ग़म पे सौ जानें भी कर देते निसार
क्या बताएँ बस ज़बाँ पर उन का नाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
शेर
ज़ब्त-ए-ग़म वुफ़ूर-ए-शौक़ और दिल-ए-ना-सुबूर-ए-इश्क़
मुझ को तो है ग़ुरूर-ए-इश्क़ आप को नाज़ हो न हो
हयात अमरोहवी
शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
पास-ए-पिंदार-ए-तबीअत दिल अगर रख ले तो क्या
है वजूद-ए-दर्द मोहकम ज़ब्त-ए-ग़म कर ले तो क्या
ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब
शेर
सुकून-ए-इज़्तिराब-ए-ग़म पे चारा-साज़ तो ख़ुश हैं
दिल-ए-बेताब की लेकिन क़ज़ा मालूम होती है
अब्दुल हई आरफ़ी
शेर
ख़ुदा जाने ये सोज़-ए-ज़बत है या ज़ख़्म-ए-नाकामी
कभी होती न थी सीने में लेकिन ये जलन पहले