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शेर
मुसव्विर सब्ज़वारी
शेर
अगर है ज़िंदगी इक जश्न तो ना-मेहरबाँ क्यों है
फ़सुर्दा रंग में डूबी हुई हर दास्ताँ क्यों है
अमीता परसुराम मीता
शेर
मैं ही ग़मगीन नहीं तर्क-ए-तअल्लुक़ पे 'कमाल'
वो भी नाशाद था उस को भी फ़सुर्दा देखा
बाग़ हुसैन कमाल
शेर
अरे ओ अदीब-ए-फ़सुर्दा-ख़ू अरे ओ मुग़न्नी-ए-रंग ओ बू
अभी हाशिए पे खड़ा है तू बहुत आगे अहल-ए-हुनर गए
वामिक़ जौनपुरी
शेर
हर इक फ़सुर्दा क़ल्ब पे छाई शगुफ़्तगी
जब छिड़ गई है बज़्म में उस गुल-बदन की बात
जयकृष्ण चौधरी हबीब
शेर
जीते जी हम तो ग़म-ए-फ़र्दा की धुन में मर गए
कुछ वही अच्छे हैं जो वाक़िफ़ नहीं अंजाम से
शाद अज़ीमाबादी
शेर
इस तरह ख़ुश हूँ किसी के वादा-ए-फ़र्दा पे मैं
दर-हक़ीक़त जैसे मुझ को ए'तिबार आ ही गया