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शेर
वो आए बज़्म में इतना तो 'फ़िक्र' ने देखा
फिर इस के बा'द चराग़ों में रौशनी न रही
अल्ताफुर्रहमान फ़िक्र यज़दानी
शेर
तह कर चुके बिसात-ए-ग़म-ओ-फ़िक्र-ए-रोज़गार
तब ख़ानक़ाह-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत में आए हैं
अमीर हम्ज़ा साक़िब
शेर
सिर्फ़ ज़िंदों ही को फ़िक्र-ए-ऐश-ओ-आसाइश नहीं
अब तो इस दुनिया में मुर्दों की भी गुंजाइश नहीं
दिलावर फ़िगार
शेर
मज़ा मतला का दे फ़िक्र-ए-दो-पहलू हो तो ऐसी हो
रहें हिस्से बराबर बैत-ए-अबरू हो तो ऐसी हो
नसीम देहलवी
शेर
बे-तकल्लुफ़ आ गया वो मह दम-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न
रह गया पास-ए-अदब से क़ाफ़िया आदाब का
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
वो और होंगे जिन को है फ़िक्र-ए-ज़ियान-ओ-सूद
दुनिया से बे-नियाज़ है मेरी ग़ज़ल का रंग
माया खन्ना राजे बरेलवी
शेर
कमर बाँधो मुक़द्दर के सहारे बैठने वालो
शिकस्त-ए-रज़्म से राहों का पेच-ओ-ख़म न बदलेगा
सय्यद बासित हुसैन माहिर लखनवी
शेर
नई बहरों में ये मिसरों के पेच-ओ-ख़म बनाता है
ये ग़ज़लें अन-गिनत लिखता है बच्चे कम बनाता है
खालिद इरफ़ान
शेर
अज़ल से सोख़्ता-सामाँ हूँ फ़िक्र-ए-आशियाँ क्या हो
न गिरती बर्क़ तो ये सोज़-ए-दिल से जल गया होता