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शेर
हम अपनी रूह को क़ासिद बना के भेजेंगे
तिरा गुज़र जो वहाँ नामा-बर नहीं न सही
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
शेर
हिदायत शैख़ करते थे बहुत बहर-ए-नमाज़ अक्सर
जो पढ़ना भी पड़ी तो हम ने टाली बे-वज़ू बरसों