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शेर
रुख़ से लहरा कर ज़नख़दाँ के हैं माइल मु-ए-ज़ुल्फ़
दौड़ता है चाह की जानिब ही प्यासा धूप में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
मस्जिद अबरू में तेरी मर्दुमुक है जिऊँ इमाम
मू-ए-मिज़्गाँ मुक़तदी हो मिल के करते हैं नमाज़
सिराज औरंगाबादी
शेर
बद-गुमानी ने मुझे क्या क्या सताया क्या कहूँ
सुब्ह को बिखरे हुए देखे थे इक दिन मू-ए-दोस्त
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
बस-कि हूँ 'ग़ालिब' असीरी में भी आतिश ज़ेर-ए-पा
मू-ए-आतिश दीदा है हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
ग़ज़ब है रूह से इस जामा-ए-तन का जुदा होना
लिबास-ए-तंग है उतरेगा आख़िर धज्जियाँ हो कर
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
शेर
नाख़ुदा है मौत जो दम है सो है बाद-ए-मुराद
अज़्म है कश्ती-ए-तन को बहर-ए-हस्ती यार का
हैदर अली आतिश
शेर
रोना बिना-ए-ख़ाना-ख़राबी है मिस्ल-ए-शम्अ'
टपके जो सक़्फ़-ए-चश्म हो तो क़स्र-ए-तन ख़राब
इमदाद अली बहर
शेर
हुई पीरी में उस घर की सी हालत ख़ाना-ए-तन की
दर-ओ-दीवार गिर कर जिस मकाँ का उठ नहीं सकता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से
बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती