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शेर
'रियाज़' एहसास-ए-ख़ुद्दारी पे कितनी चोट लगती है
किसी के पास जब जाता है कोई मुद्दआ' ले कर
रियाज़ ख़ैराबादी
शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
शेर
न लगी मुझ को जब उस शोख़-ए-तरहदार की गेंद
उस ने महरम को सँभाल और ही तय्यार की गेंद
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
शेर
कल मातम बे-क़ीमत होगा आज उन की तौक़ीर करो
देखो ख़ून-ए-जिगर से क्या क्या लिखते हैं अफ़्साने लोग
उबैदुल्लाह अलीम
शेर
नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले
जिसे तुम ने किया ख़ामोश उस से क्या सदा निकले