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शेर
रह न सके ख़ुदी में मस्त हो न सके ख़ुदा में जज़्ब
मुफ़्त हुए ज़लील-ओ-ख़्वार कूचा-ए-ए'तिबार में
इज्तिबा रिज़वी
शेर
तब्अ कह और ग़ज़ल, है ये 'नज़ीरी' का जवाब
रेख़्ता ये जो पढ़ा क़ाबिल-ए-इज़हार न था
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया
मजरूह सुल्तानपुरी
शेर
न जाने कौन सी मंज़िल पे आ पहुँचा है प्यार अपना
न हम को ए'तिबार अपना न उन को ए'तिबार अपना