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शेर
मुँह ज़र्द ओ आह-ए-सर्द ओ लब-ए-ख़ुश्क ओ चश्म-ए-तर
सच्ची जो दिल-लगी है तो क्या क्या गवाह है
नज़ीर अकबराबादी
शेर
हुस्न के जल्वे नहीं मुहताज-ए-चश्म-ए-आरज़ू
शम्अ जलती है इजाज़त ले के परवाने से क्या
आनंद नारायण मुल्ला
शेर
रुख़्सत-ए-चश्म-ए-तमाशा का है मातम वर्ना
इक ख़लिश पहलू में रहती थी जहाँ आज भी है
इम्तियाज़ अहमद क़मर
शेर
दिल है निसार मर्दुमक-ए-चश्म-ए-दोस्त पर
बीमार को है मर्दुम-ए-बीमार से ग़रज़
मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता
शेर
है इन दिनों में गर्दिश-ए-चश्म-ए-बुताँ का दौर
तेरा ज़माना गर्दिश-ए-दौराँ निकल गया