aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "qad..."
बहुत गहरी है उस की ख़ामुशी भीमैं अपने क़द को छोटा पा रही हूँ
झुक के जो आप से मिलता होगाउस का क़द आप से ऊँचा होगा
साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबरतू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
तुझ से मैं जंग का एलान भी कर ही दूँगामेरे दुश्मन तू मिरे क़द के बराबर तो आ
रौशनी में अपनी शख़्सियत पे जब भी सोचनाअपने क़द को अपने साए से भी कम-तर देखना
चश्म-ए-बद-दूर अजब ख़ुश-क़द-ओ-क़ामत होगाअभी फ़ित्ना है कोई दिन में क़यामत होगा
वही सफ़्फ़ाक हवाओं का सदफ़ बनते हैंजिन दरख़्तों का निकलता हुआ क़द होता है
जब किसी ने क़द ओ गेसू का फ़साना छेड़ाबात बढ़ के रसन-ओ-दार तक आ पहुँची है
शर्म आई है मुझे अपने क़द-ओ-क़ामत परमाँ के जब होंठ न पहोंचे मिरी पेशानी तक
क़द ओ गेसू लब-ओ-रुख़्सार के अफ़्साने चलेआज महफ़िल में तिरे नाम पे पैमाने चले
जब तक कि न देखा था क़द-ए-यार का आलममैं मो'तक़िद-ए-फ़ित्ना-ए-महशर न हुआ था
अपने दराज़-क़द पे बहुत नाज़ था जिन्हेंवो पेड़ आँधियों में ज़मीं से उखड़ गए
ये कैसा वक़्त मुझ पर आ गया हैमिरे क़द से मिरा साया बड़ा है
'ग़ालिब' तिरी ज़मीन पे लिक्खी तो है ग़ज़लतेरे क़द-ए-सुखन के बराबर नहीं हूँ मैं
घटती बढ़ती रही परछाईं मिरी ख़ुद मुझ सेलाख चाहा कि मिरे क़द के बराबर उतरे
मैं तुझ से झुक के मिला हूँ मगर ये ध्यान रहेबड़ा नहीं हूँ मगर तुझ से क़द में कम भी नहीं
हम तो अपने क़द के बराबर भी न हुएलोग न जाने कैसे ख़ुदा हो जाते हैं
क्या हमसरी की हम से तमन्ना करे कोईहम ख़ुद भी अपने क़द के बराबर न हो सके
ये झाँक लेती है अंदर से आरज़ू-ख़ानाहवा का क़द मिरी दीवार से ज़ियादा है
जब भी झुक कर मिलता हूँ मैं लोगों सेहो जाता हूँ अपने क़द से ऊँचा मैं
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